Monday, 21 March 2016

वो चाह, वो राह

ठान कर एक बात नई,
सोचा सोच अपनी बदलूँगा,
तेज़ नहीं मैं वक़्त से,
पर इस वक़्त के साथ चलूँगा.

चलते चलते इस राह पर,
कई लोग से मैं मिलूंगा
बेहतर नही उन सबसे,
अपने कल से बेहतर बनुंगा.

बेहतर बनने कि चाह में,
साै हज़ार बार गिरूँगा,
हिम्मत का मरहम लगाके,
वाै राह मैं फिर से चलूँगा.

सोच अपनी वो साथ लिए,
यादों से अपनी लड़ूंगा,
मेरे सपनों से जूड़े हे जौ,
उन्हें ख़ुशियों से रंग दूँगा.

निकला हूँ इस राह पर,
अब पिछे नहीं मूडूंगा,
उस सोच को, उस चाह को,
मैं कर के हि रहूंगा.