Monday, 5 September 2016

मिट्टी का इन्सान



भटक कर उस शाम एक अनजान गली से गुज़र रहा था,
अदभुत था नज़ारा,
मिट्टी का इन्सान कई प्रतिमाएँ मिट्टी से बुन रहा था ।
तुलिका लिए अपने हाथो मे, कल्पनाओ से रंग को चुन रहा था,
दंग रह गई ये निगाहें,
जब देखा वो प्रश्न पुछ के उस मूरत से जवाब उससे वो सुन रहा था ।

वो विद्वान था या मूर्ख इन्सान ?
एसे विचार ये मन बुन रहा था,
अगर हे वो भगवान है हर जगह,
फिर इन्सान मिट्टी को ही क्यों चुन रहा था?
आवाज़ उसके अंदर ही थी,
फिर वो मूरत से क्यों सुन रहा था?

अदभुत था नज़ारा,
मिट्टी का इन्सान कई प्रतिमाएँ मिट्टी से बुन रहा था ।