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Monday, 5 September 2016

मिट्टी का इन्सान



भटक कर उस शाम एक अनजान गली से गुज़र रहा था,
अदभुत था नज़ारा,
मिट्टी का इन्सान कई प्रतिमाएँ मिट्टी से बुन रहा था ।
तुलिका लिए अपने हाथो मे, कल्पनाओ से रंग को चुन रहा था,
दंग रह गई ये निगाहें,
जब देखा वो प्रश्न पुछ के उस मूरत से जवाब उससे वो सुन रहा था ।

वो विद्वान था या मूर्ख इन्सान ?
एसे विचार ये मन बुन रहा था,
अगर हे वो भगवान है हर जगह,
फिर इन्सान मिट्टी को ही क्यों चुन रहा था?
आवाज़ उसके अंदर ही थी,
फिर वो मूरत से क्यों सुन रहा था?

अदभुत था नज़ारा,
मिट्टी का इन्सान कई प्रतिमाएँ मिट्टी से बुन रहा था ।



Sunday, 14 August 2016

आज़ाद नहीं ।

वक़्त गुज़रते आज़ाद हुवे हम, पर इस वक़्त से हम आज़ाद नहीं,
सोच बदली, यह देश भी बदला पर इस सोच से हम आज़ाद नहीं,

साल गुज़रते हमने चलना सीखा, पर दौड़ लगाने हम आज़ाद नहीं,
उम्मीद खिली, हिम्मत मिली, पर चुपे हुवे उस डर से ये मन अब भी आज़ाद नहीं,

क़लम उठाई, लिखना भी सिखा, पर आज भी कई गलियों मे हम बोलने को आज़ाद नहीं,
उम्र बढ़ी, तजुरबा भी बढ़ा, पर बढ़ती हुई इन यादों से हम 
पल भर के लिए आज़ाद नहीं,

ज़ख़्म लगे, मरहम भी लगे, पर वक़्त गुज़रते भी उस दर्द के एहसास से आज़ाद नहीं,
सिख गये हम डट कर जिन्ना, पर आज़ादी के दौर मे भी जितें हम आज़ाद नहीं, 

आज़ाद हो चाहे हम रिश्तों से, पर कई जिम्मदारियों से 
हम आज़ाद नहीं,
सालों से आज़ाद हे हम, पर कई सालों से हम आज़ाद नहीं,

Saturday, 30 July 2016

२ पंक्ति की ज़ुबानी ।














You may or may not connect with all of it, but if you said "no dude I just loved it" after reading the first line, Like it and Share it. 

It's a Pratik Nanda creation 😇✌🏻️

Monday, 11 July 2016

उस रात..

भारी था ये मन उस कल के विचारों से,
पर इस आज को मुझे इन शब्दों में उतारना था ।

इरादों से उसके अनजान थे,
फिर भि कुछ यादों को दिल से छुड़ाना था ।

शब्दों कि कमी थी, इन आँखों में नमी थी,
पर कल फिर से ज़िंदगी से क़दम मिलाना था ।

ये वक़्त ना रुका है, ना आगे कभी रुकेगा,
बस यही अपने झहन में उतारना था ।

नींद ना जाने कहा छुपी थी, 
रात भी नज़रों में रुकी थी,
ख़याल तो बस एक हि था इस मन में,
इस रात को अपनी सुबह से मिलाना है ।








Wednesday, 15 June 2016

वो चित्र!!

ना देखा था जिन रंगो को, उन रंगो को महसूस किया,
पल ही पल मे इन नज़रों ने एक नये चित्र को रुप दिया!

लगा पहले वो कहीं देखा सा,
फिर समजा उसे अनदेखा सा!

उसमे आसमाँ भी था
और हवायें भी थी,
कुदरत की वादियाँ,
और फिझ़ायें भी थी.

पर ...

उस नीले नीले आसमान में चिंता की गहराई ना थी,
उन बहती हुइ हवाओ में ग़मों की परछाई ना थी,
झलक रहा था उन वादियों में कुदरत का वो जहाँ, पहुंच गई नज़रे मेरे मन को लेकर वहाँ,

सुना था मैंने और जाना था मुझे वहाँ,
शायद इसीलिए उस चित्र को मैंने बना लिया अपना जहाँ!




Tuesday, 24 May 2016

देखो, पढ़ो ओर महसूस करो

एक खोज पे सभी निकलते है,
कई सवाल हम सबसे करते है,
पर अनजान है उस बात से
उनके जवाब भी हम साथ लिए चलते है,

हमें ये भी चाहिये, हमें वो भी चाहिये,
आज़ादी के संग ख़ुशी भी चाहिये,
शान्ति भी चाहिये, प्यार भी चाहिये,
जीत के जश्न का मज़ा भी चाहिये,

आज़ादी तो अपनी मर्ज़ी से जिने में है,
पुछना है उन समाज के डर से जी रहे लोगों से पुछो.

ख़ुशी तो अपने देखने का नज़रिया है,
देखना है तो कभी ख़ुद को ख़ुद कि नज़र से देखो.

शांति तो इस शोर के बीच में है,
महेसुस करना है तो इन घडकनो को सुनो.

प्यार तो दुनिया के कण कण में है,
करना हि है तो पहेले ख़ुद से ईझहार करो.

असली मज़ा तो इस सफ़र में है,
समजना है तो मंज़िल कि ओर एक क़दम बढ़ा के देखो.

जीत तो लोगों के दिल जितने में है,
सिखना है तो एक अनजान शख़्स को मुस्कुरा के देखो.

Tuesday, 26 April 2016

Ek khamosh chehra

Ek khamosh chehra kuch bayan karne chala,
Dil se jude kuch taar wo juda karne chala,
Nazadikyan un yaadoin se mita ke,
Ek Naya jahan banane wo chala,

Ek khamosh chehra uss raat ko kuch bayan karne chala,
Kal ki baat bhula ke wo, Kadam ek aaj ki aur badhane wo chala,
Duvidha ki bedi sang, Azad udne wo chala

Ek khamosh chehra uss raat ko
Kuch bayan karne chala,
Dabi dhadkne uss dil ki sunane sabko wo chala,
Khudse khud ki jang ka elaan karne wo chala,
Khoyi huvi si aas ko jagane fir se chala,
Kadam kadam badha ke,
Ek khamosh chehra uss raat se ek nayi safar pe chala.