वक़्त गुज़रते आज़ाद हुवे हम, पर इस वक़्त से हम आज़ाद नहीं,
सोच बदली, यह देश भी बदला पर इस सोच से हम आज़ाद नहीं,
साल गुज़रते हमने चलना सीखा, पर दौड़ लगाने हम आज़ाद नहीं,
उम्मीद खिली, हिम्मत मिली, पर चुपे हुवे उस डर से ये मन अब भी आज़ाद नहीं,
क़लम उठाई, लिखना भी सिखा, पर आज भी कई गलियों मे हम बोलने को आज़ाद नहीं,
उम्र बढ़ी, तजुरबा भी बढ़ा, पर बढ़ती हुई इन यादों से हम
पल भर के लिए आज़ाद नहीं,
ज़ख़्म लगे, मरहम भी लगे, पर वक़्त गुज़रते भी उस दर्द के एहसास से आज़ाद नहीं,
सिख गये हम डट कर जिन्ना, पर आज़ादी के दौर मे भी जितें हम आज़ाद नहीं,
आज़ाद हो चाहे हम रिश्तों से, पर कई जिम्मदारियों से
हम आज़ाद नहीं,
सालों से आज़ाद हे हम, पर कई सालों से हम आज़ाद नहीं,
Good one!
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