मिलती होगी तेरी मेरी साँसे हमसे निकल कर
कही दूर उन बादलों के पिछे,
वरना सिर्फ़ हमें हि क्यों
उसमें एक दूसरे कि तस्वीर नज़र आती हैं?
घुलती होगी उसकी महक,
अंदर छुपी बूँदों से लिपट कर,
वरना सिर्फ़ हमें हि क्यों,
बारिश के पानी से प्यार कि ख़ुशबू आती हैं?
आती होगी शाम भी,
उसमें घुल कर,
वरना सिर्फ़ हमें हि क्यों,
बिन बाती एक दूसरे के चेहरे पे वो लाली नज़र आती हैं?
मिलती होगी तेरी मेरी साँसें हमसे निकल कर,
कही दूर उन बादलों के पिछे,
जो हर रात हमें ऐसे ही,
एक दूसरे के ख़यालों से जगाती हैं।
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