अच्छा नहीं लगता..
जब काम करते करते कोई बिन बुलाये ख़याल मुझे सैर पे ले चलते है
तो मेरी ज़रूरतों को अच्छा नहीं लगता
मगन होकर जब उसकी ऊँगली थामे मैं निकल पड़ता हुँ बेवजह मुस्कुराते उन रास्तों पर
तो मेरे दिन से जुड़ी अनजान लोगों की उम्मीदों को अच्छा नहीं लगता
लापरवाह, नकचडा कहेते है वो मुझे
कमाल कह लो इंसानी फ़ितरत को
मैं निकलता हुँ अपने ख़्वाब पूरे करने
तो उन नाकारो को अच्छा नहीं लगता
दस्तूर ही ये समाज का
सीधी राह पे कोई पहचानता तक नहीं
हम टैडी राह क्या चला
किसी को हमारा चलना अच्छा *नहीं* लगता
कहेते नही हम तो क्या हुआ
सहते तो है?
हम अपने काम से काम रखे
तो भी किसी को अच्छा लगता
कैसे करना चाहिए और क्या करना चाहिए
किसी ने नहीं सिखाया हमें
जब ख़ुद से सीख कर आज क़दम बढ़ा रहे है
तो उन आदर्शवादों को अच्छा नहीं लगता
बस बुरा इसी बात लगता है
जब काम करते करते बिन बुलाये ख़याल हमें सैर पे ले चलते है
तो हमारी ज़रूरतों को अच्छा नहीं लगता.....
जब काम करते करते कोई बिन बुलाये ख़याल मुझे सैर पे ले चलते है
तो मेरी ज़रूरतों को अच्छा नहीं लगता
मगन होकर जब उसकी ऊँगली थामे मैं निकल पड़ता हुँ बेवजह मुस्कुराते उन रास्तों पर
तो मेरे दिन से जुड़ी अनजान लोगों की उम्मीदों को अच्छा नहीं लगता
लापरवाह, नकचडा कहेते है वो मुझे
कमाल कह लो इंसानी फ़ितरत को
मैं निकलता हुँ अपने ख़्वाब पूरे करने
तो उन नाकारो को अच्छा नहीं लगता
दस्तूर ही ये समाज का
सीधी राह पे कोई पहचानता तक नहीं
हम टैडी राह क्या चला
किसी को हमारा चलना अच्छा *नहीं* लगता
कहेते नही हम तो क्या हुआ
सहते तो है?
हम अपने काम से काम रखे
तो भी किसी को अच्छा लगता
कैसे करना चाहिए और क्या करना चाहिए
किसी ने नहीं सिखाया हमें
जब ख़ुद से सीख कर आज क़दम बढ़ा रहे है
तो उन आदर्शवादों को अच्छा नहीं लगता
बस बुरा इसी बात लगता है
जब काम करते करते बिन बुलाये ख़याल हमें सैर पे ले चलते है
तो हमारी ज़रूरतों को अच्छा नहीं लगता.....
