भटक कर उस शाम एक अनजान गली से गुज़र रहा था,
अदभुत था नज़ारा,
मिट्टी का इन्सान कई प्रतिमाएँ मिट्टी से बुन रहा था ।
तुलिका लिए अपने हाथो मे, कल्पनाओ से रंग को चुन रहा था,
दंग रह गई ये निगाहें,
जब देखा वो प्रश्न पुछ के उस मूरत से जवाब उससे वो सुन रहा था ।
वो विद्वान था या मूर्ख इन्सान ?
एसे विचार ये मन बुन रहा था,
अगर हे वो भगवान है हर जगह,
फिर इन्सान मिट्टी को ही क्यों चुन रहा था?
आवाज़ उसके अंदर ही थी,
फिर वो मूरत से क्यों सुन रहा था?
अदभुत था नज़ारा,
मिट्टी का इन्सान कई प्रतिमाएँ मिट्टी से बुन रहा था ।

Waah!
ReplyDeleteजीवन का फलसफा
ReplyDeleteThis is just one amazing poem and thought...You re great my friend.
ReplyDeleteMitti ka insan, ye kavita sun raha tha,
Mitti se bani hai ye dunai, Mitti me sama jana tha.
The answer lies in what you believe: Man Created God , or God Created Man!
Mind blowing..
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteThank you friends :)
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