भारी था ये मन उस कल के विचारों से,
पर इस आज को मुझे इन शब्दों में उतारना था ।
इरादों से उसके अनजान थे,
फिर भि कुछ यादों को दिल से छुड़ाना था ।
शब्दों कि कमी थी, इन आँखों में नमी थी,
पर कल फिर से ज़िंदगी से क़दम मिलाना था ।
ये वक़्त ना रुका है, ना आगे कभी रुकेगा,
बस यही अपने झहन में उतारना था ।
नींद ना जाने कहा छुपी थी,
रात भी नज़रों में रुकी थी,
ख़याल तो बस एक हि था इस मन में,
इस रात को अपनी सुबह से मिलाना है ।
