ना देखा था जिन रंगो को, उन रंगो को महसूस किया,
पल ही पल मे इन नज़रों ने एक नये चित्र को रुप दिया!
लगा पहले वो कहीं देखा सा,
फिर समजा उसे अनदेखा सा!
उसमे आसमाँ भी था
और हवायें भी थी,
कुदरत की वादियाँ,
और फिझ़ायें भी थी.
पर ...
उस नीले नीले आसमान में चिंता की गहराई ना थी,
उन बहती हुइ हवाओ में ग़मों की परछाई ना थी,
झलक रहा था उन वादियों में कुदरत का वो जहाँ, पहुंच गई नज़रे मेरे मन को लेकर वहाँ,
सुना था मैंने और जाना था मुझे वहाँ,
शायद इसीलिए उस चित्र को मैंने बना लिया अपना जहाँ!

